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सिखवाल समाज का इतिहास, वंशावली और सांस्कृतिक परंपराएँ | Sikhwal Samaj

📜 सिखवाल समाज: संपूर्ण इतिहास, उत्पत्ति, वंशावली, संगठन एवं सांस्कृतिक विस्तार

भारतीय सनातन संस्कृति, परंपरा और वैदिक इतिहास में सिखवाल ब्राह्मण समुदाय का स्थान अत्यंत गौरवशाली और प्राचीन है। यह समाज जगत के पालनहार भगवान श्री राम के जन्म से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। महर्षि श्रृंगी(ऋष्य श्रृंगी) की वंश परंपरा से प्रादुर्भूत होने के कारण इस समाज के इतिहास में वेद, तपस्या, यज्ञ और सांस्कृतिक समरसता का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

महर्षि श्रृंगी ऋषि का जीवन भारतीय ऋषि परंपरा, तपस्या, वेदज्ञान, यज्ञ और धर्म-संस्कृति से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण कथाओं से समृद्ध है। उनके जीवन से जुड़े प्रसंगों में अंगदेश में वर्षा, माता शान्ता से विवाह, महाराज दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ तथा भगवान श्रीराम के जन्म से संबंधित परंपराएँ विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। प्रस्तुत विवरण उपलब्ध परंपरागत कथाओं, ग्रंथों और समाज में प्रचलित मान्यताओं के आधार पर संकलित है।

📜 महर्षि शृंगी ऋषि का जीवन परिचय एवं पावन कथा

तपस्या • वेदज्ञान • शान्ता विवाह • पुत्रेष्टि यज्ञ • श्रीराम जन्म

🌿 महर्षि श्रृंगी ऋषि का जन्म एवं तपस्या

महर्षि विभाण्डक ऋषि अत्यंत तपस्वी, तेजस्वी और जितेन्द्रिय ऋषि थे। वे वन में रहकर कठोर तपस्या और साधना करते थे। उनका जीवन तप, संयम और ब्रह्मचर्य से युक्त था। उनके तपोबल की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई थी।

परंपरागत कथा के अनुसार, एक समय महर्षि विभाण्डक वन में तपस्या कर रहे थे। उसी समय एक दिव्य सुंदरी को देखकर उनके मन में कुछ समय के लिए चंचलता उत्पन्न हुई और उनका वीर्य जल में गिर गया। उसी समय वहाँ एक मृगी आई और उसने उस जल को पी लिया। इसके फलस्वरूप वह गर्भवती हो गई।

वह मृगी साधारण मृगी नहीं थी। वह पूर्व जन्म में एक देवकन्या थी। भगवान ब्रह्मा के वरदान के कारण उसे मृगी का रूप प्राप्त हुआ था। उसे यह वरदान था कि मृगी रूप में रहते हुए वह एक मनुष्य बालक को जन्म देने के बाद अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त कर सकेगी।

समय आने पर उस मृगी ने एक अत्यंत तेजस्वी बालक को जन्म दिया। उस बालक के मस्तक पर श्रृंग अर्थात् सींग के समान विशेष उभार था। इसी कारण उसका नाम ऋष्य श्रृंग(श्रृंगी ऋषि) पड़ा।

बालक के जन्म के बाद वह मृगी अपने पूर्व दिव्य स्वरूप को प्राप्त कर अपने लोक को चली गई और बालक का पालन-पोषण महर्षि विभाण्डक ने अपने आश्रम में किया। इस प्रकार ऋष्यशृंग का जन्म एक असाधारण और दिव्य प्रसंग के रूप में वर्णित है।

इसी तेजस्वी बालक को आगे चलकर महर्षि श्रृंगी ऋषि के नाम से जाना गया।

🕉️ महर्षि विभाण्डक और ऋषि श्रृंगी

महर्षि विभाण्डक अपने पुत्र को संसार के आकर्षणों से दूर रखकर तप और ब्रह्मचर्य के मार्ग पर चलाते थे। ऋषि श्रृंगी भी पिता की आज्ञा का पालन करते हुए वन में रहते और अपनी साधना में निरंतर लगे रहते थे।

वे इतने तपस्वी थे कि उनके आश्रम में वेद-मंत्रों की ध्वनि, यज्ञ और साधना का वातावरण बना रहता था। उनके तप और पवित्रता की ख्याति देवताओं तक पहुँची।

ऋषि श्रृंगी का जीवन तप, संयम, वेदज्ञान और धर्मनिष्ठा का प्रतीक माना जाता है।

🌧️ अंगदेश में अकाल और राजा लोमपाद

उसी समय राजा लोमपाद के राज्य में एक समय वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ गया। प्रजा अत्यंत दुखी हो गई और राज्य में अन्न तथा जल का संकट उत्पन्न होने लगा। राजा ने इस समस्या का समाधान जानने के लिए विद्वान ब्राह्मणों और ऋषि-मुनियों से परामर्श किया।

तब उन्हें बताया गया कि महातपस्वी ऋषि श्रृंगी के राज्य में आने और उनके तपोबल से ही वर्षा हो सकती है। ऋषि श्रृंगी को वन से राज्य में लाने के लिए विशेष प्रयास किए गए। उनके राज्य में आने के बाद राजा लोमपाद ने उनका आदर-सत्कार किया और उन्हें सम्मानपूर्वक अपने राज्य में रखा।

इसके बाद ऋषि श्रृंगी ने वृष्टि के लिए यज्ञ एवं वैदिक अनुष्ठान संपन्न कराया। ऋषि के तपोबल और विधिपूर्वक किए गए यज्ञ के प्रभाव से लंबे समय से रूठे हुए मेघ बरसने लगे और राज्य में वर्षा हुई। वर्षा होने से सूखी धरती फिर से हरी-भरी हो गई तथा प्रजा को अकाल और संकट से राहत मिली।

🌧️ वर्षा का प्रसंग

परंपरा में ऋषि श्रृंगी के तपोबल और विधिपूर्वक किए गए यज्ञ के प्रभाव को अंगदेश में वर्षा होने का प्रमुख कारण बताया गया है। यह प्रसंग उनके तप और आध्यात्मिक शक्ति की प्रसिद्ध कथा का महत्वपूर्ण भाग है।

🌸 माता शान्ता और महर्षि श्रृंगी का विवाह

ऋषि श्रृंगी के तपोबल से राजा लोमपाद के राज्य में वर्षा हुई और लंबे समय से चले आ रहे अकाल का संकट दूर हुआ। राज्य में फिर से सुख-समृद्धि लौट आई। ऋषि श्रृंगी के इस महान उपकार से राजा लोमपाद अत्यंत प्रसन्न और कृतज्ञ हुए।

राजा लोमपाद ने ऋषि श्रृंगी का विधिपूर्वक सम्मान किया और उनके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की। ऋषि श्रृंगी के तप, ज्ञान, संयम और पवित्र जीवन से राजा अत्यंत प्रभावित थे। इसी अवसर पर राजा ने अपनी पुत्री माता शांता का विवाह महर्षि श्रृंगी के साथ करने का निश्चय किया।

माता शांता का पालन-पोषण राजा लोमपाद के राजमहल में हुआ था। वे अत्यंत संस्कारी, सरल, धार्मिक एवं सद्गुणों से संपन्न थीं। राजा लोमपाद ने अपनी पुत्री शांता का विवाह महर्षि श्रृंगी के साथ करने का निर्णय लिया और विधिपूर्वक विवाह का आयोजन किया।

विवाह के अवसर पर ऋषि श्रृंगी का राजकीय सम्मान के साथ स्वागत किया गया। वैदिक रीति-रिवाजों और मंत्रोच्चार के साथ ऋषि श्रृंगी और माता शांता का विवाह संपन्न हुआ। इस प्रकार माता शांता ऋषि श्रृंगी की धर्मपत्नी बनीं।

विवाह के पश्चात माता शांता ने भी अपने पति के तपस्वी एवं धार्मिक जीवन में उनका साथ दिया। ऋषि श्रृंगी और माता शांता का यह विवाह आगे चलकर भारतीय ऋषि परंपरा में एक महत्वपूर्ण प्रसंग के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

इस प्रकार वृष्टि यज्ञ से राजा लोमपाद के राज्य को अकाल से मुक्ति मिली और उसी प्रसंग के बाद माता शांता एवं महर्षि श्रृंगी का पवित्र विवाह संपन्न हुआ।

👑 महाराज दशरथ और पुत्र प्राप्ति की इच्छा

अयोध्या के महाराज दशरथ के जीवन में एक समय ऐसा आया जब उन्हें संतान प्राप्ति की चिंता होने लगी। वे अपने वंश की निरंतरता चाहते थे और योग्य पुत्र की प्राप्ति के लिए धार्मिक उपाय करना चाहते थे।

परंपरागत कथा के अनुसार महाराज दशरथ ने महर्षि शृंगी से पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराने का अनुरोध किया। महर्षि शृंगी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की।

महर्षि शृंगी अयोध्या पहुँचे। महाराज दशरथ ने उनका विधिपूर्वक स्वागत, पूजन और सम्मान किया तथा पुत्र प्राप्ति की अपनी मनोकामना उनके सामने रखी।

🔥 पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजन

महर्षि शृंगी ने वेदोक्त विधि-विधान के अनुसार पुत्रेष्टि यज्ञ का अनुष्ठान प्रारंभ किया। यज्ञ में विधिपूर्वक आहुतियाँ दी गईं और देवताओं का आह्वान किया गया।

यज्ञ के पूर्ण होने पर अग्निकुण्ड से एक दिव्य पुरुष के प्रकट होने की कथा मिलती है। उसके हाथ में सुवर्ण पात्र था जिसमें दिव्य खीर अथवा चरु भरा हुआ था।

उस दिव्य प्रसाद को महाराज दशरथ को प्रदान किया गया और उसे उनकी रानियों में विधिपूर्वक बाँटने के लिए कहा गया।

महाराज दशरथ ने प्राप्त दिव्य खीर को अपनी रानियों में बाँटा। परंपरागत रामकथा के अनुसार इसी यज्ञ के फलस्वरूप महारानी कौशल्या के गर्भ से श्रीराम, कैकेयी के गर्भ से भरत तथा सुमित्रा के गर्भ से लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ।

🙏 भगवान श्रीराम का जन्म

पुत्रेष्टि यज्ञ के फलस्वरूप अयोध्या में महारानी कौशल्या के गर्भ से भगवान श्रीराम का जन्म हुआ। कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न का जन्म हुआ।

इस प्रकार महर्षि शृंगी की कथा भगवान श्रीराम के जन्म की महान परंपरा से जुड़ जाती है। सिखवाल समाज की धार्मिक और सामाजिक परंपरा में इस प्रसंग को विशेष श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है।

📖 राजा परीक्षित और शृंगी ऋषि का श्राप

महर्षि शृंगी से जुड़ा एक अन्य प्रसिद्ध प्रसंग राजा परीक्षित के साथ संबंधित है। एक दिन राजा परीक्षित वन में शिकार करते हुए बहुत थक गए। उन्हें भूख और प्यास लगी।

जल की खोज करते हुए वे एक ऋषि के आश्रम में पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक मुनि को ध्यान में लीन देखा। राजा ने उनसे जल माँगा, लेकिन ऋषि गहन ध्यान में होने के कारण कोई उत्तर नहीं दे सके।

भूख-प्यास और थकान के कारण राजा के मन में क्रोध उत्पन्न हुआ। कथा के अनुसार उन्होंने धनुष की नोक से एक मृत साँप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया।

जब ऋषि के पुत्र शृंगी को इस घटना की जानकारी हुई तो उन्होंने राजा परीक्षित को श्राप दिया। यह प्रसंग आगे चलकर भागवत पुराण की प्रसिद्ध कथा से जुड़ता है। 

विभांडक ऋषि पुत्र शृंगी ऋषि और शमीक ऋषि पुत्र शृंगी ऋषि में अंतर

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार दो अलग-अलग कालों में शृंगी ऋषि के नाम से दो अलग-अलग ऋषि हुए हैं। एक ही नाम के दो ऋषि होने से इन दोनों को कभी-कभी एक ही व्यक्ति समझ लिया जाता है, जबकि ये दोनों ऋषि अलग-अलग हैं। इनमें मुख्य अंतर इस प्रकार है।

विभांडक ऋषि पुत्र शृंगी ऋषि

विभांडक ऋषि पुत्र को ऋष्यशृंग या शृंगी ऋषि कहा जाता है। इनका जन्म त्रेता युग (यानी रामायण काल) में हुआ था। इनके मस्तक पर सींग के आकार का एक विशेष उभार था, जिसके कारण इनका नाम ऋष्यशृंग पड़ा। उन्होंने अपने पिता से वेद, वेदांग, योग, यज्ञ और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया। उनका प्रारंभिक जीवन वन और आश्रम में तपस्या में बीता।

उनका विवाह माता शांता से हुआ। शांता राजा दशरथ और रानी कौशल्या की पुत्री थीं, जिन्हें अंग देश के राजा रोमपाद ने दत्तक पुत्री के रूप में स्वीकार किया था।

शृंगी ऋषि ने राजा दशरथ का पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया था, जिसके कारण भगवान राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ था।

शमीक ऋषि पुत्र शृंगी ऋषि

शमीक ऋषि पुत्र शृंगी ऋषि का जन्म द्वापर युग यानी महाभारत काल में हुआ था। वे अपने तेज, तप तथा ब्रह्म शक्ति के लिए प्रसिद्ध माने जाते हैं।

एक बार राजा परीक्षित शमीक ऋषि के आश्रम में पहुंचे। उस समय शमीक ऋषि गहन ध्यान में लीन थे, जिसके कारण वे राजा को अपेक्षित उत्तर नहीं दे पाए।

इस पर राजा परीक्षित क्रोधित हो गए और एक मरे हुए साँप को ऋषि के गले में डाल दिया।

जब इस घटना का पता उनके पुत्र शृंगी ऋषि को चला, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। क्रोधवश उन्होंने अपने तपोबल से राजा परीक्षित को श्राप दिया कि सातवें दिन तक्षक नाग के दंश से उनकी मृत्यु हो जाएगी।

निष्कर्ष

उपरोक्त तथ्यों एवं घटनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि दोनों ऋषियों को एक ही व्यक्ति मानना उचित नहीं है। ये दोनों अलग-अलग युगों में हुए अलग-अलग ऋषि थे। 

आज के सिखवाल समाज का सबंध विभाण्डक ऋषि पुत्र श्रृंगी ऋषि से है।

🌿 सिखवाल समाज की परंपरा में महर्षि शृंगी

महर्षि शृंगी की कथा सिखवाल समाज की धार्मिक, सांस्कृतिक और वंशीय परंपरा में विशेष स्थान रखती है। उनके जीवन में तपस्या, वेदज्ञान, यज्ञ, धर्म और संस्कारों का विशेष महत्व दिखाई देता है।

समाज की परंपराओं में महर्षि शृंगी को आदि ऋषि एवं वंश परंपरा से जोड़कर श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। उनके जीवन से संबंधित कथाएँ आज भी समाज की ऐतिहासिक और धार्मिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

महर्षि श्रृंगी ऋषि के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

🙏 महर्षि शृंगी ऋषि को सादर नमन 🙏

तप, वेदज्ञान, यज्ञ और धर्मपरंपरा के महान प्रतीक महर्षि शृंगी ऋषि की पावन स्मृति को नमन।

🌟 उपसंहार 🌟

सिखवाल समाज का इतिहास केवल एक वंश की गाथा नहीं, बल्कि भारतीय सनातन संस्कृति, यज्ञ, तप, वेदज्ञान और संस्कारों की परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

महर्षि शृंगी ऋषि की पावन परंपरा, माता शान्ता की धर्मनिष्ठा और श्रीराम जन्म से जुड़ी कथाएँ समाज की सांस्कृतिक स्मृति में विशेष स्थान रखती हैं।

आज का सिखवाल समाज अपनी गौरवशाली विरासत का सम्मान करते हुए शिक्षा, संगठन, सेवा और आधुनिक विकास के पथ पर निरंतर आगे बढ़ रहा है।

🙏 महर्षि शृंगी ऋषि एवं माता शान्ता को सादर नमन 🙏

संकलन एवं प्रस्तुति: सिखवाल समाज केकड़ी डिजिटल एवं ऐतिहासिक अनुसंधान पोर्टल

📜 कुल, गोत्र एवं कुलम्बा (माता) सूची
नीचे उपलब्ध सूची में विभिन्न कुल एवं उपाधियों के साथ संबंधित गोत्र तथा कुलम्बा (माता) की जानकारी दी गई है। सब अज्ञात गोत्र लोगों को ‘कश्यप’ गोत्र मानना व बोलना चाहिये क्योंकि ‘कश्यप’ सब के मूलपुरुष हैं।
क्रम संख्या कुल एवं उपाधि गोत्र कुलम्बा (माता) क्रम संख्या कुल एवं उपाधि गोत्र कुलम्बा (माता)
1 पालरिया, पुरोहित वशिष्ठ ब्रह्माणी (फलोदी माता) 30 कूराड़िया तिवारी कोड्ल्य आसापुरी
2 कोलर्या पुरोहित वशिष्ठ चामुण्डा 31 क्रिया पंडित कनकेश भैयास
3 धनद्या पुरोहित वशिष्ठ दुर्गा 32 देव्या पंडित भारद्वाज गवालजा
4 नागोरी ओझा वशिष्ठ ब्रह्माणी, (फलोदी, माता) 33 पण्ड्या भारद्वाज चामुण्डा
5 अठारिया उपाध्याय वशिष्ठ ब्रह्माणी, (फलोदी, माता) 34 जर्या बोहरा भारद्वाज संचाय
6 माणम्या उपाध्याय वशिष्ठ ब्रह्माणी, (फलोदी, माता) 35 झीझावत बोहरा भारद्वाज संचाय
7 जयवाल उपाध्याय भारद्वाज मुसाय 36 बोहरा जोशी भारद्वाज बोहोत्तर
8 दुख्ड्या पाण्ड्या कनकेश ब्रह्माणी, (फलोदी, माता) 37 वर्धा आचार्य भारद्वाज जालप
9 भरुड़ उपाध्याय वशिष्ठ ब्रह्माणी, (फलोदी, माता) 38 पाठक भारद्वाज निम्बाय
10 पीपाड़ा पाण्ड्या भारद्वाज जेठायी (पांडोखाय) (ज्येष्ठायिनी) 39 डैगाण्या व्यास कुण्डलेश दुर्गा
11 नागला तिवारी या त्रिपाठी भारद्वाज जेठायी 40 चन्द्रावत व्यास भारद्वाज गवालजा
12 बागड़ी तिवारी कुण्डलेश जीणाय 41 कुचोर्या व्यास भारद्वाज चामुण्डा
13 गरवड़िया तिवारी भारद्वाज गवालजा 42 राकवाल व्यास भारद्वाज गवालजा
14 तवकऱ्या तिवारी भारद्वाज चामुण्डा 43 बोहरा व्यास भारद्वाज बुआल
15 कर्केंडिया तिवारी भारद्वाज कंवलय 44 झांझरा व्यास बोहरा भारद्वाज कनकेश्वरी
16 नोसार्या तिवारी भारद्वाज नौसार 45 झांझरा व्यास बोहरा भारद्वाज कनकेश्वरी
17 तुखार तिवारी भारद्वाज जेठायी 46 बाहड़ा जोशी कनकेश दुदेश्वर
18 गोंदोड़िया तिवारी भारद्वाज बडखरण 47 गुवाया जोशी भारद्वाज उपसर्ण
19 बड़लाण्या तिवारी वशिष्ठ बड़वासन 48 नरोधन्या तिवारी कुण्डलेश जाखण्डा
20 बांगड़ा जोशी भारद्वाज चामुण्डा 49 लाड जोशी कुण्डलेश गुणाय
21 चांदणा जोशी भारद्वाज चामुण्डा 50 निम्बाध्य जोशी भारद्वाज संचाय
22 मण्डोवरा जोशी कोडिन्य चामुण्डा 51 बालसूर्या जोशी भारद्वाज संचाय
23 तड़बा तिवारी वशिष्ठ बड़वासन 52 क्रूरशील जोशी भारद्वाज गवालजा
24 गोड़वाला पाण्ड्या कनकेश खींवज 53 काश्यपा जोशी भारद्वाज ज्वालामुखी
25 मण्डोवरा व्यास कनकेश दूघेसर 54 जलदेवा जोशी भारद्वाज ख्रींवज
26 लिलर्या व्यास वत्स जेष्ठायिनी 55 कोट्या जोशी भारद्वाज बूवाल
27 दर्धा ओझा भारद्वाज गुंजन 56 सांवरिया जोशी भारद्वाज गवालजा
28 नल्या ओझा भारद्वाज जीवन 57 तुगनावत जोशी भारद्वाज चामुण्डा
29 अगवाल उपाध्याय कनकेश बाराही
शृंग ऋषि नमः   सतीमाता नमः

सिखवाल परिवार के गोत का सतीमाता के स्थान।

सिखवाल परिवार के सदस्य महाराणा प्रताप जी के समय उन्हीके फौज मे उच्चे पदोपर पदस्थ थे। सिखवाल परिवार के पुरखो का इतिहास बहुत वीरतासे पूर्ण है। पुरखो का इतिहास हमारी धरोवर है। पंडिया (पुरखोका) परिवार (उदयपुर) सिखवाल परिवार का इतिहास इस की पुष्टि करता है। चितौडगड और हाळदी घाटी के पास पांडिया परिवारके सतीमातायो का स्थान है। पंडिया परिवार उदयपुर, चितौडगड, सुटेफा मे आज अभी निवास करता है।

सतीमाता और कुलदेवी अलग है। पहले सती प्रथा थीब्रह्मोसमाज के संस्थापक राजा राममोहन राय ने सतीप्रथा का विरोध किया और सन 1829 सतीप्रथा बंद हुई। जिस गोत्र के परिवार में कोई माता सती हो जाती हैं, उसी गोत्र की वह सतीमाता होती हैं। सतीमाता के स्थान ( मंदिर,चबुतरा, छत्री, पाल ) बनी है, इस स्थान पर जाकर आवश्यक दर्शन करे। एक गोत्र के सतीमाता का स्थान एक से अधिक हो सकते है। सभी सतीमाता के स्थान विशेष चमत्कारी है।सतीमाता के दर्शन से आपको मनवांछित फल प्राप्त होगा। श्रध्दा भाव से आवश्य दर्शन करे।

सिखवाल परिवार के 57 गोत्र है। 23 गोत्रकी सतीमाता की जानकारी है। सिखवाल परिवार के अन्य गोत्र की सतीमाता के स्थान ज्ञात है, तो कृपया जानकारी देवे। 👇

संकलनकर्ता- सोर्स- सोशल मीडिया (Social Media) BY-बालकिशन गो. तिवारी नांदेड महाराष्ट्र
संपर्क मो. नं. 9509749006, 9421766080

क्रम संख्या गोत्र / परिवार सती माता का स्थान
1नागला तिवारीनागला तिवारी की सतीमाता मंदिर स्थान गांव खवास (केकडी, कादेडा़ के पास) यहाँ पर दो सतीमाता के स्थान है। १) सतीमाता २) कुँवारी सतीमाता। (2) सेरडी (रायला) बोरखेडा मे सतीमाता का स्थान हैं।
2पिपाडा पांड्यापिपाडा पांड्या की सतीमाता का स्थान गांव 1) सुठेपा (भीलवाडा) 2) सती माता मंदिर गांव पोटला चितौड 3) सतीमाता का स्थान दौलतगड 4) जडा़ना तहसील राशमी जिला चितौडगढ़ मे भी है। 5) मालीदा मे भी है।
3ओझा (नागोरी)ओझा (नागोरी) की सतीमाता का स्थान गांव 1) बलिया (डिडवाना), 2) गुन्दोज, 3) रोल (रोल परिवार की) 4) ब्राम्हणो की सेरडी की मे भी है। 5) लांबिया (भीलवाडा) के तालाब के पाल पर स्थान है।
4मंडोरा व्यासमंडोरा व्यास की सतीमाता का स्थान 1) सावर (जिल्हा अजमेर) , 2) नारायणखेडा मे स्थान है। 3) कसोरिया (भीलवाडा) मे स्थान है।
5पालड्या पुरोहितपालड्या पुरोहित की सतीमाता का स्थान 1) बस्सी (चितौड) 2) भीमडियास जिल्हा भीलवाडा मे भी है।
6आठरा उपाध्यायआठरा उपाध्याय की सतीमाता का स्थान मेडता सिटी मे है। 2) सतीमाता का स्थान फूलिया कलां जिल्हा - शाहपुरा मे है।
7आगीवाल उपाध्यायआगीवाल उपाध्याय की सतीमाता का स्थान 1) टोडारायसिंग (जिल्हा - टोक) , 2) ग्राम आशाहोली (तहसील रायपुर जिला भीलवाडा) मे बैशाख कृष्ण अमावस्या समत 1444 मे सती हुई। 3) ग्राम खटवाडा भीलवाडा के पास सतीमाता का स्थान है। 4) ग्राम रुद तहसिल राशमी सती माता सोनल देवी छत्री है।समय 1455 से 1500 आस पास माना जाता है।
8नराधानिया तिवारीनराधानिया तिवारी की सतीमाता का स्थान कुरज (जिला राजसमंद) मे है।
9गोडावाला पांडियागोडावाला पांडिया की सतीमाता का स्थान बुंदी के पास पटेला की जावटी मे है।
10तडबा तिवाडी (जोशी)तडबा तिवाडी (जोशी) की सतीमाता का स्थान 1) कलियास (आसींद) बबराणा - तहसील बनेडा 2) गांव सेरडी 3) चितोड जिले के गांव चौथपुरा मे सास-बहु दोनों का एकही चबूतरा बना है, बिचमे पार्टेशन कर रखा है। चमत्कारी स्थान है। 4) सतीमाता का स्थान पांडोली स्टेशन मे भी है। 5) तडबा तिवारी अंटाली ( मांडल ,भीलवाडा ), रामगड (आजमेर) निवास करते है।इनकी सती माता अंटाली (भीलवाडा ) के तलाब की पाल पर है।
11माणम्यामाणम्या की सतीमाता का स्थान 1) करौली गंगानगर के पास 2) जोजवा जिल्हा भीलवाडा मे भी है। 3) निमज के पास मालखेडा गांव मे हैं।
12बागडा जोशीबागडा जोशी की सतीमाता का स्थान देवरिया तहसील कोटडी जिला भीलवाड़ा मे हैं।
13बालसुर्या जोशीबालसुर्या जोशी का सतीमाता का स्थान बिराटीया मे है। यहा पर पूरब, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर मे चार सती माता के स्थान है। चमत्कारी स्थान है।
14चांदना जोशीचांदना जोशी की सतीमाताका स्थान धनोप मे है।
15झिंझावत बोराझिंझावत बोरा की सतीमाता का स्थान आँवा जिल्हा कोटा मे हैं।
16लाड जोशीलाड जोशी की 1) सतीमाता का स्थान गाँव 1) नगरी (चितौड) बस्सी के पास नदी के किनारे चबुतरा बना है। और भैरुजी का स्थान है। 2) सती माता का स्थान पांडोली स्टेशन तहसील कपासन जिला चितौडगड है। नगरीवाले ओर पांडोली वाले दोन्ह भाई थे। ब्राम्हण की सेरडी से गाव रोलीया आकर रहे थे और वहाँ से एक भाई नगरी (बस्सी के पास ) दुसरा भाई पांडोली रहता था। सतीमाता पहले खोलपुरा तलाब कि पाल पर थी। सन 2018 मे आदर पूर्वक पांडोली स्टेशन मे विराजमान किया गया।
17गरबरिया तिवारीगरबरिया तिवारी की सतीमाता का स्थान और जुझार जी गांव मकरेडा मे है। सतीमाता की ज्योत का स्थान ग्राम अम्मा ( सुठेपा) के पास है। और माता का स्थान जालीया द्वितीय जिल्हा आजमेर के पास है।
18पंडिया (अमा वाले)पंडिया (अमा वाले) की सतीमाता का स्थान आमा के पास फलोदी ग्राम (जिल्हा भीलवाडा) मे है। यहाँ पर कल्पवृक्ष भी है।
19पंडिया (चितोड, उदयपुर, सुटेफा)पंडिया (चितोड, उदयपुर, सुटेफा) की सतीमाता का स्थान चितौडगड (किल्ले मे तिन स्थानोपर) और हालदी घाट्टी के पास मे है। यह परिवार उत्तरप्रदेश से चितौड आया था। महाराणा के फौज मे विशेष पद पर पदस्थ थे। आज परिवार के कुछ सदस्य उदयपुर, चितोड गड, सुटेफा मे निवास करते हैं।
20कुचरिया व्यासकुचरिया व्यास की सतीमाता का स्थान ग्राम बुझडा तहसील देवगड मे है।
21हल्दिया उपाध्यायहल्दिया उपाध्याय की की सतीमाता का स्थान ग्राम जोलपा तहसील खानपुर जिला झालावाड 2) छोटी कुंडिया जिला शाहपुरा भीलवाडा।
22बोरा पंडीतबोरा पंडीत की का सतीमाता का स्थान काजलिया मे है।
23पाण्डयापाण्डया की परीवार की सती माता का स्थान पिडवा के पास हेमडागाँव भवानीमंडी रोडपर गाँव के तलाबमे है। ओर भैरवजी चितौडगड के किल्ले के उपर बावडी के आंदर आल्यामे विराजीत है।बावडी के सिमने हानुमान जी का स्थान है।
स्रोत-आधारित नोट: यह सूची उपलब्ध प्रकाशित जानकारी के अनुसार तैयार की गई है। जहाँ स्रोत में एक से अधिक स्थान बताए गए हैं, उन्हें उसी अनुसार रखा गया है। अन्य गोत्रों के सामने बिना प्रमाणित जानकारी के कोई स्थान नहीं जोड़ा गया है।

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