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महर्षि श्रृंगी ऋषि से सिखवाल परम्परा तक पूरा लेख

🌿 महर्षि श्रृंगी ऋषि से सिखवाल परम्परा तक

🕉️ मंगलाचरण

ॐ नमो भगवते ऋषि श्रृंगाय ॐ

ओंकार बिन्दु सहित, ध्यान धरें अवतार।
सिद्धनाथ सो आत्मा नमस्कार ओंकार।।

🌿 महर्षि श्रृंगी की तपोभूमि

अथः भगवान श्री राम के पिता महाराज दशरथ के समय आज से करीब 8 लाख वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में ऋषि श्रृंगी अखण्ड तप किया करते थे और समाधि में लगे रहते थे। केवल केले का रस चाट कर ही तपस्या में संलग्न थे। उनके तप के प्रभाव से उस क्षेत्र का नामकरण भी श्रृंगेरी क्षेत्र, श्रृंगेरी ग्राम, श्रृंगेरी पर्वत व श्रृंगेरी तालाब उद्भव हो गया।

🔱 आद्य शंकराचार्य का श्रृंगेरी आगमन

आज से 2100 वर्ष पूर्व भगवान शंकर के अवतार भगवत्पाद आद्य शंकराचार्य बौद्ध धर्म उन्मूलन उच्छेद कर सनातन धर्म का उद्धार कर धर्म स्थापनार्थ विचरण करते हुए श्रृंगेरी क्षेत्र पहुँचे और श्रृंगेरी ग्राम में मधुकरी कर वहाँ श्रृंगेरी तालाब के तीर पर वट वृक्ष तले विश्राम कर रहे थे। उस समय ग्रीष्मकाल की तप्त भूमि पर प्रकृति विरोध धर्म को प्रेम सेवा व दया रूप प्रत्यक्ष देखकर आश्चर्य में पड़ गये।

देखते हैं कि नवला व नाग प्रेम से निर्वैर रूप से खेल रहे हैं और फिर देखा कि नाग ने अपने भोजन दादुर के बच्चे को मुँह में पकड़ कर गर्मी पर से उठाकर जल में छोड़ दिया। ऐसी ईश्वर की लीला को देखकर भगवान शंकराचार्य ध्यान मग्न हो गये। ध्यानावस्था में उस तपोभूमि का मूल हृदय देखकर अपने शिष्यों से बोले—

📜 शंकर दिग्विजय श्लोक

(शंकर दिग्विजय श्लोक सर्ग 12-64)

यत्राधूताड्युत मनुष्य शृङ्गस्तपश्चर्यतास्मात् भद्रन्त रजं।
संस्पर्शमात्रेण वितीर्णं भद्रा विद्योतते यत्र च तुंगभद्रा।।

अभ्यागतार्चित कल्पशाखा कुलंकषाधीत समस्तशाखाः।
इज्याशतेयज्ञ समुल्सन्तः शान्तान्तराया निवसन्ति सन्त।।

जहाँ ब्रह्म में अपने अन्तःकरण को लगा देने वाले ऋषि श्रृंग आज भी उत्तम तपस्या कर रहे हैं और जहाँ पर स्पर्श मात्र से कल्याण के देने वाली तुंगभद्रा सुशोभित होती है। ॥64॥

जहाँ पर अभ्यागत पुरुषों की पूजा से कल्पवृक्ष को भी लज्जित करने वाले, समस्त वेदों को पढ़ने वाले, सैकड़ों यज्ञों से प्रसन्न होने वाले शान्तचित्त, सज्जन लोग निवास करते हैं। ॥65॥

🏛️ श्रृंगेरी में मठ और वेदान्त विद्यापीठ

वहाँ पर आचार्य श्री भगवान शंकराचार्य ने अपने श्रवण मात्र से मोक्ष देने वाले मुख्य भाष्य विद्याग्रहण में समर्थ विद्वान शिष्यों को पढ़ाया। अपने व्याख्यान उपदेश से शंकर ने शेषनाग को भी लज्जित कर नतमुख बना दिया और प्राणि मात्र के समस्त अज्ञान को शंकर ने दूर किया और बृहस्पति के समान जीव और ईश्वर के शुद्ध स्वरूप का अभेद प्रतिपादन किया और श्रृंगी ऋषि के अनुग्रहीत पूर्व मीमांसक शिष्यों को उत्तरमीमांसा का उपदेश देकर कृतार्थ किया।

वहाँ इन्द्र के विमान के समान सब शिल्पों को प्रगट करने वाला प्रसाद बनवाया और ब्रह्मादि देवताओं के द्वारा पूजित देवता की पूजा स्थापित की। जो शारदाम्बा के नाम से प्रसिद्ध है और अभिष्ट वर देने वाली आज भी श्रृंगेरीपुर में विद्यमान है।

आचार्य शंकर ने श्रृंगेरी में प्रथम मठ बनाकर वेदान्त विद्यापीठ की स्थापना की और सनातन धर्म शासनाकूल धर्म प्रचार के लिये दशनामी संन्यास सम्प्रदाय की स्थापना कर धर्म प्रचार केन्द्र सर्वप्रथम यहीं स्थापित किया। वही श्रृंगेरी क्षेत्र ही श्रृंगी ऋषि कुल था।

👑 महाराज दशरथ और महर्षि श्रृंगी

और भगवान श्रृंगी ऋषि अपने समय के अद्वितीय पूर्व मीमांसक थे। वे ऋषिकुल आश्रम में कई ऋषियों के आत्मजों व मानसपुत्रों को मीमांसा का अध्ययन करवाया करते थे। उसी काल में भारत के चक्रवर्ती महाराजा दशरथ राज्य करते थे जिनके बहुत समय से सन्तानोत्पत्ति नहीं हुई जिस कारण वे खिन्न व उदास रहते थे। उनके राज्य गुरु विश्वामित्र ने उन्हें सन्तानोत्पत्ति के लिये महर्षि श्रृंगी से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाने की सलाह दी।

इस पर महाराज दशरथ ने उन्हें दक्षिण से उत्तर में बुलवाया और श्रद्धापूर्वक विनय कर प्रार्थना करी कि भगवन् कृपा करके मेरे दशरथोत्पत्ति के लिये पुत्रेष्टि यज्ञ कराके मुझ दास को कृतार्थ करें।

🔥 पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजन

इस पर महर्षि श्रृंगी ने कृपा कर यज्ञ का आयोजन किया और ऋषि ने जो जो आज्ञा दी उन सब को महाराज दशरथ ने शिरोधार्य कर सब को यथा विधि वाक्य प्रमाण से पालन किया।

आचार्य महर्षि श्रृंगी ने यज्ञ के आयोजन हितार्थ अपनी शिष्य मण्डली को बुलाकर सब को उनकी योग्यतानुसार ब्रह्मा (इन्द्र), ऋत्विज, उपदेष्टा, उपस्कृत्य और भूयसी के अधिकारी नियुक्त किये। फिर नक्षत्र काल, अवधि वस्तु निर्धारित कर वैदिक विधि विधान से यज्ञ की पूर्णाहुति हुई। तब यज्ञवेदी में से भगवान अग्निदेव कर कमण्डलु पायस पात्र (खीर का पात्र) लिये प्रगट हुए।

🌺 पायस प्रसाद और भगवान राम का जन्म

वहाँ महाराज दशरथ को पात्र देकर महारानियों को भोजन की आज्ञा दी। महाराज ने पायस पात्र बड़ी महारानी कौशल्या को दिया और आधा हृदय कौशल्या ने उस पायस को कैकेयी और सुमित्रा में विभक्त कर प्रसाद पायकर आनन्दित हुई और गर्भ धारण कर भगवान राम आदि को जन्म दे कृतार्थ हुई। तब महाराज ने महर्षि श्रृंगी का पूजन किया और फिर ऋषियों का पूजन कर सब को यथोचित भेंट दक्षिणा देकर सब को सन्तुष्ट किया और फिर करबद्ध प्रार्थना की कि भगवान!

आज मेरे धन्य भाग्य कि आप के अनुग्रह से मेरा सकल मनोरथ पूर्ण हुआ और सब मेरी करबद्ध एक और प्रार्थना है कि इन मेरे बन्धोई महाराज श्री लोमपाद के मालव देश में कई वर्षों से अनावृष्टि काल का साम्राज्य हो रहा है। आप दयालु समर्थ हैं। महाराज मालव नरेश लोमपाद और मालव की प्रजा का कष्ट दूर करें।

🌧️ मालव देश और वृष्टि यज्ञ

तदनन्तर महाराज शाल्व नरेश लोमपाद ने षष्टांग दण्डवत् कर करबद्धता से महर्षि को प्रार्थना कर अपने मालव देश की प्रजा के लिये अपने साथ लेकर मालव देश चले गये।

मालव देश में महर्षि श्रृंगी ने वृष्टि यज्ञ का आयोजन किया और राजा लोमपाद ने उनकी आज्ञानुसार सब प्रकार से सब पद पदार्थों का प्रबन्ध कर दिया। महर्षि श्रृंगी ने इस यज्ञ को सम्पूर्ण करने के लिये अपने मानस सप्त पुत्रों को जो कि उनके प्रधान याज्ञिक विद्वान शिष्य थे उन्हें—इन्द्र, ऋत्विज, उपदेष्टा आदि नियुक्त कर वैदिक मीमांसा ज्ञान-विज्ञान द्वारा महावृष्टि यज्ञ सम्पूर्ण किया तथा उस इन्द्र यज्ञ से भगवान इन्द्र ने प्रसन्न होकर राजा को वरदान दिया कि तेरे इस मालव देश में कभी काल नहीं पड़ेगा।

इस प्रकार यज्ञ को सम्पूर्णता और उसके उत्तम फल के प्राप्त होने से मालव नरेश ने प्रसन्न होकर महर्षि श्रृंगी को दक्षिणा में उनकी सेवा करने के लिये अपनी कन्या “शान्ता” का कन्यादान कर दिया।

🌸 शान्ता की कथा

जगद्गुरु गोवर्धन पीठाधीश्वर श्री निरंजन देव तीर्थ द्वारा कथित “शान्ता” जो कि ब्रह्मऋषि “अंगीरस” की कन्या थी। इसकी माता का नाम “आरणवी” था। इस अंगीरस ऋषि की धर्म पत्नी का प्रसव होने के एक मास बाद ही स्वर्गवास हो गया। इस कन्या को ऋषि अंगीरस के शिष्य राजा लोमपाद ने पालपोस कर बड़ा करके ऋषि को दान में दी थी। जिसकी कोख से एक ही पुत्र आत्मज ऋषि श्रृंगेय उत्पन्न हुआ जिसने जीवन पर्यन्त अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन कर यति धर्म में अनुरक्त रहा।

🌿 महर्षि श्रृंगी के सात प्रमुख शिष्य

महाराज लोमपाद ने महर्षि श्रृंगी के सातों शिष्यों को दक्षिणा स्वरूप अलग-अलग ग्राम व जागीरी प्रदान कर सन्तुष्ट किया। तत्पश्चात वे सातों शिष्य—

1. ज्ञानऋषि 2. धाराधीश 3. भीमेश्वर 4. गोविन्द ऋषि 5. दुग्धेश्वर ऋषि 6. अनिलेश्वर ऋषि 7. जयपाल ऋषि।

अपनी-अपनी जागीरी के ग्रामों में अपने-अपने शिष्य परिवारों सहित निवास करने लग गये।

📜 सातों शिष्य परम्पराओं का विस्तार

ज्ञानऋषि अपने 6 शिष्यों—

1. आदि 2. मुकन्द 3. कमल 4. काद्रम 5. सोमेश्वर 6. रामेश्वर

के सहित।

धाराधीश अपने 4 शिष्यों—

1. केशव 2. गोलेश्वर 3. केशववाणि 4. संतोष

के सहित।

भीमेश्वर अपने 3 शिष्यों—

1. लव 2. वत्स 3. गर्गेश

के सहित।

गोविन्द अपने 3 शिष्यों—

1. ताण्डेश्वर 2. सोनकेश 3. मदनेश्वर

के सहित।

दुग्धेश्वर अपने 3 शिष्यों—

1. महेश्वर 2. धूमेश्वर 3. शान्तेश्वर

के सहित।

अनिलेश्वर अपने 3 शिष्यों—

1. कौशिक 2. बाहुडेश 3. धर्मेश्वर

के सहित और जयपाल ऋषि अपने-अपने शिष्यों—

1. वसुदेव 2. हेमेश्वर

के सहित निवास करने लगे।

🕉️ चार ऋषि परम्पराएँ

ये सब श्रृंगी ऋषि की ऋषिकुल परम्परा में केवल ऋषियों की ही सन्तानें—

1. वसिष्ठ 2. भारद्वाज 3. कण्वेश 4. कुण्डलेश कौडिल्य

की सन्तानें दीक्षित थीं।

ये चारों ऋषियों की सन्तानें सत वंश 24 कुल शिष्य परम्परा में पूर्व मीमांसा का विद्याध्ययन करते हुए रहते थे। ये सब मालव देश में दिये हुए दक्षिणारूपी ग्राम सकराणी, सरेंड़ी, मांगेरास, नारायणखेड़ा, सूंटापा, खांचरोल, सोबती आदि ग्रामों में अलग-अलग निवास करने लगे और महर्षि श्रृंगी के अनुयायी होने से ये सब श्रृंगवाल अर्थात् सिखवाल व सुखवाल कहलाने लगे।

🔄 गोत्र से बाहर विवाह की परम्परा

उन 24 ऋषियों ने अपने चारों गोत्रों में से अपने-अपने गोत्र को छोड़कर दूसरे गोत्र वालों से सगाई सम्बन्ध विवाह आदि करने लगे क्योंकि सब सन्तानें तो केवल चार ऋषियों की ही थी और सब अनुयायी महर्षि श्रृंगी की थी। इसलिए अपने गोत्र को टालकर सम्बन्ध किया जाता है।

🔱 गोत्र शब्द का अर्थ

गोत्र शब्द का अर्थ है गो अर्थात् इन्द्रिय और त्र अर्थात् तीन अर्थात् जिनकी तीन प्रकार की इन्द्रियों से जो उत्पन्न होवे—5 ज्ञानेन्द्रिय, 5 कर्म इन्द्रिय और तीसरा मन इन्द्रिय—उसी का नाम गोत्र होता है।

वंश का मूल-पुरुष जो होता है उससे गोत्र चलता है। जैसे गर्ग, गौतम, वसिष्ठ, भारद्वाज आदि गोत्र हैं। जो जिससे उत्पन्न होता है उसका गोत्र उसी के नाम से होता है जैसे “वशिष्ठस्य अपत्यंपुमान वाशिष्ठ”—वशिष्ठ से उत्पन्न हुआ वाशिष्ठ और “भरद्वाजस्य अपत्यंपुमान भारद्वाज”—भरद्वाज से उत्पन्न हुआ भारद्वाज गोत्रवाला होता है।

धर्म कर्म, मन्त्र उच्चारण में गोत्र प्रकट किया जाता है और बोला जाता है। जिनका गोत्र याद नहीं उनके लिये धर्मशास्त्र ने नियम किया है।

📖 अज्ञात गोत्र के लिए शास्त्रीय विधान

॥ अज्ञात गोत्राणां सर्वेषां कश्यप गोत्रत्वम् ॥

सब अज्ञात गोत्र लोगों को ‘कश्यप’ गोत्र मानना व बोलना चाहिये क्योंकि ‘कश्यप’ सब के मूलपुरुष हैं।

📚 स्रोत
पुस्तक: सिखवाल ब्राह्मण परिशीलन
लेखक: पं. बुद्धिप्रकाशदेव उपाध्याय सिखवाल